आसनसोल। बांकुड़ा जिले
के बिष्णुपुर प्रचलित है मंदिरों के शहर के रूप में। अयोध्या का जमींदार बनर्जी परिवार
पिछले 216 से नियमित पारिवारिक पूजा आयोजित करता आ रहा है। आयोजकों का दावा है कि उनके
परिवार की दुर्गा शेरों की सेना नहीं, बल्कि बाघों की सेना अपने साथ रखती है। इस घर
की दुर्गा मूर्ति चंडी रुप में बनाई जाती है। भले ही लगातार समय बदलता रहा, लेकिन इसके
प्रति निष्ठा, श्रद्धा तथा इसकी लोकप्रियता
में कोई कमी नहीं आई है। पूजा में पहले जैसी भव्यता नहीं रह गई है। लेकिन विधि-विधान,
नियम, कायदे और रीति-रिवाजों में कोई बदलाव नहीं आया है। मूर्तियां पीढ़ियों से कुम्हार
बनाते आ रहे हैं।
आयोजकों ने दावा किया
कि परिवार के पूर्वज राममोहन बनर्जी की मुलाकात श्रीरामपुर के अंग्रेज नीलकर साहब से
हुई थी। नीलकर साहब खुश हुए और उन्होंने अपनी संपत्ति का 50 प्रतिशत दान कर दिया। तब
से, बनर्जी परिवार की समृद्धि धीरे-धीरे बढ़ने लगी। बनर्जी परिवार ने एक के बाद एक
मौजा खरीदकर बांकुड़ा के अयोध्या गांव में अपनी जमींदारी शुरू की। इस परिवार की काशी,
वाराणसी और तत्कालीन बिहार के कई जगहों पर भी जमींदारी थी। इस घराने के पास देबोत्तर
एस्टेट है। राज्य में बारहवां शिव मंदिर, गिरि गोवर्धन मंदिर और दुर्गा मंदिर की स्थापना
हुई। उसके बाद दुर्गा पूजा शुरू हुई। इसी तरह, अब तक पुरानी परंपरा के अनुसार, पूजा
के दौरान नए कागज, चांदी की पालकी और चांदी के बर्तन निकाले जाते हैं। आजकल, धूमधाम
कम हो गई है। हालांकि, बनर्जी परिवार में देवी की पूजा में भक्ति की कोई कमी नहीं है।
अष्टमी पर नियमों के अनुसार चावल का कटोरा चढ़ाया जाता है। परिवार के सदस्य मनोहर बनर्जी
ने कहा कि अब जमींदारी युग की भव्यता नहीं है। फिर भी पूजा बहुत धूमधाम से मनाई जाती
है। परिवार के सदस्य पूजा के दिन बहुत खुशी के साथ बिताते हैं। बड़ी संख्या में ग्रामईण
भी शामिल होते हैं।

