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कृष्णानगर में नीले रंग की दुर्गा की पूजा करता है चटर्जी परिवार

नदिया जिला मुख्यालय कृष्णानगर के ऐतिहासिक चटर्जी परिवार द्वारा पिछले 350 वर्षों से अनोखी नीले रंग की दुर्गा की पूजा की जा रही है, जिसे 'आदि नील दुर्गाबाड़ी' के नाम से जाना जाता है। इस प्राचीन और अनूठी परंपरा की शुरुआत अविभाजित बंगाल के बारीसाल जिले में हुई थी, जो आज भी अपनी पुरानी मान्यताओं और विशेष रीति-रिवाजों के साथ जीवंत है। परिवार की यह सदियों पुरानी परंपरा सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टिकोण से बंगाल की समृद्ध विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।

आर्थिक धारा डेस्क
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17 अक्टूबर 2026 को 09:01 pm बजे
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कृष्णानगर में नीले रंग की दुर्गा की पूजा करता है चटर्जी परिवार
नीले रंग की दुर्गा प्रतिमा|Arthik Dhara Photo

आसनसोल। नदिया जिला मुख्यालय कृष्णानगर के नाज़िरापाड़ा निवासी चटर्जी परिवार 350 सालों से नीले रंग की दुर्गा की पूजा करता है। यह आदि नील दुर्गाबाड़ी के नाम से चर्चित है। पुरानी मान्यताएं और पुराने रीति-रिवाज़ आज भी बरकरार हैं। दशमी के दिन देवी को विदाई देने से पहले लोग पानता चावल, कच्चू की सब्ज़ी, मटर दाल का बडा और गंधराज नींबू खाते हैं।

पूजा की शुरुआत अविभाजित बंगाल के बारीसाल ज़िले के बमरैल गांव में चिंताहरण चटर्जी ने की थी। आजादी के बाद चटर्जी परिवार कृष्णानगर आ गया। पहले देवी की त्वचा का रंग गहरा भूरा होता था। दावे के अनुसार एक वर्ष मूर्ति कलाकार रात में तूफान के दौरान मूर्ति को रंग रहा था। पूरी रात काम करने के बाद, भोर की रोशनी में, उसने देखा कि देवी की त्वचा का रंग अपराजिता के फूल की तरह नीला हो गया था। परिवार के मुखिया चिंताहरण ने कहा कि रात सपने में देवी ने उन्हें नीले रंग में पूजा करने का आदेश दिया। इसके बाद नीले रंग की दुर्गा की पूजा शुरू हुई। परिजनों के अनुसार मूर्ति की पूजा घर में एकचाला प्रतिमा की होती है। गणेश और कार्तिक की जगह बदली होती है। सातवें, आठवें और नौवें दिन पहले खस्सी की बलि दी जाती थी। अब गन्ने और केले की बलि दी जाती है। बांग्लादेश में भैंस की बलि का रिवाज था। इसके बंद होने के बाद, पूजा का इंचार्ज अपना हाथ काटकर खून चढ़ाता है। मां की पूजा उल्टी तरफ से की जाती है और छठे दिन घर के बेल के पेड़ की पूजा की जाती है। पूजा शाक्त के हिसाब से होती है। सातवें, आठवें और नौवें दिन मां को फाइबर वाला खाना चढ़ाया जाता है। दसवें दिन, पांता चावल, दाल का बडा और कच्चू साग चढ़ाए जाते हैं। चावल के पाउडर को केले के पत्तों में पिटुली के साथ मिलाकर इंसान का रूप बनाया जाता है और उसे बलि दी जाती है। 

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आर्थिक धारा संपादकीय डेस्क — वित्तीय बाजार, अर्थव्यवस्था, कॉर्पोरेट जगत और राष्ट्रीय मामलों पर निष्पक्ष, सटीक एवं विश्वसनीय विश्लेषण।

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