पुरुलिया। निम्न जाति होने के कारण दुर्गा मंदिर में पूजा की अनुमति
नहीं मिली थी। यहां तक कि महाअष्टमी की पुष्पांजलि तक देने की अनुमति नहीं थी। धीवर
जाति के लोगों ने अपनी इस बेइज्जती के बाद मीटिंग की। निर्णय लिया कि अपना दुर्गा मंदिर
बनाएंगे और पूजा करेंगे। यह कहानी है आजादी के 14 साल पहले की। पुरुलिया शहर के चौकबाजार
में ठाकुरदालान में होती थी दुर्गापूजा। अगले वर्ष 1334 फूस का दुर्गा मंदिर बनाया
गया और वहां मां दुर्गा की पूजा की तैयारी शुरू हुई। आयोजकों में केशव धीवर, तिनकरी
धीवर और बांकू धीवर मुख्य थे। समस्या पूजा करानेवाले पुजारी की थी। वर्ण व्यवस्था,
सामाजिक छुआछूत को धीवरों ने चुनौती दी थी, इसलिए कोई स्थानीय पुजारी पूजा के लिए तैयार
नहीं था। आयोजकों ने दावा किया कि इस संकट का समाधान मां दुर्गा ने ही किया। आयोजक
मंडली के एक सदस्य के सपने में मां दुर्गा आईं और कहा कि बांकुड़ा जिले के मेजिया के
पुजारी उनकी पूजा करेंगे। आयोजक मेजिया गए। चक्रवर्ती परिवार में पागल ठाकुर नाम के
पुजारी थे। पूरी कहानी सुनने के बाद वे पूजा करने के लिए तैयार हो गए। दुर्गा मंदिर
में ढाक बजने लगे। महाष्टमी के फूल चढ़ाए गए। इसके बाद नियमित रूप से पूजा आयोजित
होने लगी । मंदिर निर्माण के लिए जमीन दान में मिली। 93 साल बीतने के बाद भी मंदिर
निर्माण का कार्य चल रहा है। धीवर समिति के सदस्य व मूर्तिकार शांतनु धीवर 22 फुट
की मूर्ति बना रहे हैं। मंडप की सजावट में सभी 12 ज्योतिर्लिंग को दिखाया जा रहा है।
केदारनाथ से काशीधाम तक। धीवर समिति ने आर्ट फॉर्म का नाम नीलकंठ धाम रखा है। पूजा
की पुरानी परंपरा एकादशी पर आतिशबाजी का है। इस बार यह और भी आकर्षक होगा। समिति
के कर्णधार मधुसूदन धीवर ने कहा कि महाअष्टमी के दिन निम्न जाति कह कर भगाए जाने का
दर्द और पीड़ा कभी नहीं भूलेंगे। पूजा बेइज्जती से पैदा हुई है। किसी से मुकाबला नहीं
करना चाहते। अतीत की बेइज्जती को याद करके अपनी मां के चरणों में खुद को सरेंडर कर
दिया है। मां के नाम पर बना तालाब और मछली कारोबार ही दुर्गा पूजा के खर्च का सोर्स
है। मेजिया के चक्रवर्ती पूजा करते आ रहे हैं।

