वर्दवान।
पिछले 75 सालों से पूर्वी बर्दवान जिले के आउसग्राम-2
ब्लॉक के घोघटला गांव का माजी परिवार एक ही पीठ पर देवी दुर्गा और देवी काली की एक
साथ पूजा करता है। शारदोत्सव के दौरान मंदिर के बाहर अलग-अलग दुर्गा प्रतिमाएं बनाकर
पूजा की जाती है, लेकिन मंदिर के अंदर दुर्गा और काली की एक साथ श्यामरूपा रूप में
पूजा की जाती है।
माजी परिवार कांकसा के जंगलमहल में श्यामरूपा मंदिर में नवमी की
बलि के लिए चावल का कटोरा भेजता था। 75 वर्ष पहले परिवार के पूर्वज सुधीर माजी समय
पर चावल नहीं भेज सके। घर लौटने के बाद उन्होंने एक पत्थर के सामने चावल का कटोरा चढ़ाया
और वहीं से इस पूजा की शुरुआत हुई। पहले घर में सिर्फ़ एक घड़ा बनाकर पूजा होती थी।
परिवार के सदस्य खुद मूर्तियां बनाते हैं। मंदिर के अंदर मूर्तियों के जोड़े को हर
तीन साल में विसर्जित किया जाता है। बोधन के दिन चूहे के बिल की मिट्टी से घड़ा स्थापित
किया जाता है। चतुर्थी पर सुशुनी, कलमी और पलंग समेत सात तरह की सब्जियों से खास प्रसाद
बनाया जाता है। पूजा के दौरान भक्तों द्वारा दिए गए कपड़े और गहने गांव की गरीब व जरूरतमंद
लड़कियों को उनके बड़े भाई और बड़ी बहनों की शादी के समय तोहफ़े के तौर पर दिया जाता
है। गांव की दुल्हनें दशमी के बजाय एकादशी के दिन सिंदूर खेल में शामिल होती हैं।

