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आसनसोल के धेनुआ ग्राम के कालीकृष्ण आश्रम में महालया को ही होती है दुर्गा पूजा, विसर्जन भी

पश्चिम बंगाल के आसनसोल स्थित धेनुआ ग्राम के कालीकृष्ण आश्रम में दुर्गा पूजा की एक बेहद अनूठी परंपरा है, जहां महालया के दिन ही मां दुर्गा की पूजा से लेकर विसर्जन तक की सभी रस्में एक साथ पूरी कर ली जाती हैं। वर्ष 1937 में स्थापित इस आश्रम में पारंपरिक परिवार के बजाय मां दुर्गा के साथ उनकी सखियों जया और विजया की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। यह विशिष्ट धार्मिक आयोजन अपनी अनूठी परंपरा और इतिहास के कारण दूर-दराज के श्रद्धालुओं के बीच भारी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

आर्थिक धारा डेस्क
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11 अक्टूबर 2026 को 12:49 am बजे
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आसनसोल के धेनुआ ग्राम के कालीकृष्ण आश्रम में महालया को ही होती है दुर्गा पूजा, विसर्जन भी
आश्रम की दुर्गा प्रतिमाएं |Arthik Dhara Photo

आसनसोल। हीरापुर के धेनुआ गांव में दामोदर नदी के किनारे बना कालीकृष्ण आश्रम दुर्गा पूजा की एक ऐसी अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है, जो इसे अन्य पूजा आयोजनों से अलग पहचान देता है। आम तौर पर दुर्गा पूजा के दौरान महालया के बाद देवीपक्ष की शुरुआत होती है और फिर निर्धारित तिथियों पर सप्तमी, अष्टमी, नवमी तथा दशमी की रस्में निभाई जाती हैं। लेकिन इस आश्रम में महालया के दिन ही मां दुर्गा की पूजा शुरू होती है और उसी दिन प्रमुख पूजा रस्में पूरी करने के बाद प्रतिमा का विसर्जन भी कर दिया जाता है। इस अनूठी परंपरा को देखने और मां दुर्गा का आशीर्वाद लेने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

दामोदर नदी का शांत किनारा, आश्रम का धार्मिक वातावरण और पूजा की विशिष्ट विधि इस आयोजन को खास बनाते हैं। यहां आस्था के साथ वर्षों से चली आ रही परंपरा का ऐसा संगम देखने को मिलता है, जो भक्तों के मन में विशेष स्थान रखता है। कालीकृष्ण आश्रम की दुर्गा पूजा की सबसे खास बात इसका समय और पूजा-विधान है। यहां महालय के दिन ही दुर्गोत्सव की प्रमुख रस्में पूरी कर ली जाती हैं। सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी से जुड़ी पूजा प्रक्रियाएं एक ही दिन में संपन्न की जाती हैं। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। सामान्य तौर पर श्रद्धालु महालय को पितरों के स्मरण और देवीपक्ष के आगमन से जोड़कर देखते हैं। इसी दिन दुर्गा पूजा की तैयारियों के बीच मां दुर्गा के धरती पर आगमन की भावना भी प्रबल होती है। ऐसे में महालय पर ही पूजा से लेकर विसर्जन तक की रस्में पूरी कर लेना इस आश्रम की परंपरा को और भी विशिष्ट बनाता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह केवल पूजा देखने का अवसर नहीं, बल्कि एक अलग धार्मिक अनुभव भी है। एक ही दिन में दुर्गोत्सव की विभिन्न रस्मों का आयोजन होने के कारण भक्तों को पूजा के अनेक चरणों को एक साथ देखने का अवसर मिलता है।

इस आश्रम की दूसरी बड़ी विशेषता मां दुर्गा की प्रतिमा के साथ स्थापित होने वाली प्रतिमाएं हैं। यहां मां दुर्गा के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक और गणेश की पारंपरिक प्रतिमाओं के स्थान पर उनकी दो सखियों जया और विजया की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। दुर्गा पूजा में मां के साथ उनके परिवार के सदस्यों की प्रतिमाएं स्थापित करने की परंपरा आम तौर पर देखने को मिलती है। लेकिन कालीकृष्ण आश्रम में जया और विजया को स्थान देना पूजा को एक अलग स्वरूप प्रदान करता है। यही कारण है कि इस आयोजन के बारे में जानने वाले लोगों के मन में इसे देखने की उत्सुकता रहती है।

स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार, कालीकृष्ण आश्रम की स्थापना वर्ष 1937 में साधक तेजानंद ब्रह्मचारी ने दामोदर नदी के किनारे की थी। नदी के पास स्थित इस आश्रम का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व लंबे समय से स्थानीय लोगों की आस्था से जुड़ा रहा है। वर्ष 1979 में देवी के स्वप्नादेश के बाद यहां आगमनी दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई थी। इसके बाद से महालय के दिन ही दुर्गा पूजा की प्रमुख रस्में पूरी करने और प्रतिमा विसर्जन करने की परंपरा लगातार निभाई जा रही है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस पूजा की शुरुआत देवी के आदेश से जुड़ी हुई है। यही मान्यता श्रद्धालुओं के लिए इस आयोजन को विशेष महत्व देती है। हालांकि, इन ऐतिहासिक और धार्मिक विवरणों का आधार स्थानीय परंपरा और लोगों से प्राप्त जानकारी है। दशकों से चली आ रही यह परंपरा बताती है कि धार्मिक आयोजनों का स्वरूप अलग-अलग स्थानों पर स्थानीय मान्यताओं, साधना-पद्धतियों और ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुसार विकसित हो सकता है। कालीकृष्ण आश्रम इसका एक विशिष्ट उदाहरण है।

 

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आर्थिक धारा संपादकीय डेस्क — वित्तीय बाजार, अर्थव्यवस्था, कॉर्पोरेट जगत और राष्ट्रीय मामलों पर निष्पक्ष, सटीक एवं विश्वसनीय विश्लेषण।

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