आसनसोल। बर्दवान पूर्व के बैकुंठपुर
में बनर्जी बाड़ी की पारिवारिक दुर्गापूजा 500 वर्ष पुरानी है। शेरशाह के शासनकाल से
पहले से दुर्गा पूजा हो रही है। तंत्र के अनुसार देवी जयदुर्गा की पूजा होती है। संधि
पूजा के दौरान बर्दवान के महाराज कीर्तिचंद के नाम से संकल्प होता है। पंचमुंडी के
आसन पर विराजमान दुर्गा प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाता है। देवी चार भुजाओं की
होती है और उनकी त्वचा चमकीले पीले रंग की है। उनके साथ लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक
या गणेश नहीं होते। उनके पैरों के पास राक्षस भैंसासुर का रंग हरा होता है। उनकी सवारी
सिंह का रूप सफेद घोड़े जैसा है। पूरे साल उन्हें दिन में दो बार भोग लगाया जाता है
और शाम के भोजन के बाद ठंडा खाना चढ़ता है। पूजा में मांसाहारी खाना बहुत ज़रूरी होता
है। रोज़ाना खाने में मछली ज़रूरी है और महाअष्टमी को मांगुर मछली का खास भोग लगाया
जाता है।
परिवार के सदस्य मानस बनर्जी के अनुसार मंदिर में रोज़ाना पूजा के
बाद, एक खास समय पर देवी का श्रृंगार किया जाता है। बनर्जी परिवार के पूर्वज सिद्ध
तांत्रिक थे। वे वाराणसी या काशी से यहां आए थे। नदी के किनारे एक झोपड़ी बनाई और पंचमुंडी
का आसन स्थापित किया। तांत्रिक साधना शुरू हुई। बर्दवान के तत्कालीन महाराज कीर्तिचंद
को देवी का सपना आया। महाराज ने संत को ज़मीन दान में दे दी। उस ज़मीन पर मंदिर बना
देवी की स्थापना की गई। पूजा पुराने तांत्रिक तरीके से ही होती है। इस साल पुरानी मूर्ति
के स्टाइल में नई मूर्ति बनाकर स्थापित की गई है। गांव सहित पूरे इलाके में इस पूजा
से जुड़ी कई चमत्कारी कहानियां फैली हुई हैं। एक अष्टमी की सुबह, बहुत ढूंढने के बाद
भी मांगुर मछली कहीं नहीं मिली। जब परिवार में सभी लोग भोग लगाने को लेकर परेशान थे,
तो बागड़ीपाड़ा की महिला ज़िंदा मांगुर मछली लेकर आई। उसने कहा कि उसने मछली नहीं पकड़ी
थी। एक अनजान बूढ़ी औरत आई और उसने मछली देकर पूजा तक पहुंचाने का आदेश दिया। बैकुंठपुर
की जयदुर्गा पूजा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है।

