आसनसोल। शांतिनिकेतन
के तालतोर की घोष ज़मींदारबाड़ी में ढाई सदी से भी ज़्यादा समय से धन देवी लक्ष्मी
और ज्ञान की देवी सरस्वती की एक साथ पूजा की परंपरा चली आ रही है। दुर्गा पूजा के बाद
उसी मंडप में लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा होती है। मूर्ति का आकार और रूप इतने सालों
में नहीं बदला है। पांच पीढ़ियों से, एक ही परिवार के कुम्हार मूर्तियां बनाते आ रहे
हैं। मूर्ति का चेहरा भी हाथ से बनाया जाता है। किसी सांचे का इस्तेमाल नहीं होता।
पूजा का तरीका भी अनोखा है। दोनों देवियों के लिए कोपई नदी से दो अलग-अलग बर्तन लाए
जाते हैं। पूजा के दौरान चीरे, नाडू, फल, मिठाई जैसी कई चीज़ें चढ़ाई जाती हैं। जमींदारी
चली गई। आर्थिक मजबूती भी नहीं है। कुछ जगहों पर प्रॉपर्टी ज़ब्त हो गई है। देवालय
की प्रॉपर्टी भी देखभाल की कमी के कारण कम हो गई है। ज़मींदारी के समय पूजा बहुत भव्य
होती थी। आरती के समय बड़े-बड़े पंखे इस्तेमाल होते थे। आस-पास के कई गांवों से हज़ारों
लोग पूजा देखने आते थे। लक्ष्मी और सरस्वती एक दूसरे की पूरक हैं। ज़मींदारी के समय
शुरू हुई परंपरा आज भी चल रही है। यह पूजा सिर्फ़ दो देवियों की पूजा नहीं है, यह एक
जड़ का खिंचाव है, विरासत का वादा है। इसलिए ज़मींदारी न होने पर भी, कोजागरी की रात
तालतोर की घोषबाड़ी में परंपरा का दीया आज भी जलता है। समय बदला है, लेकिन आस्था नहीं।
रौनक खो गई है, लेकिन परंपरा नहीं खोई है।
ब्रेकिंग न्यूज़
लक्ष्मी, सरस्वती की पूजा एक साथ शांतिनिकेतन तालतोर की घोष ज़मींदारबाड़ी में
आसनसोल के शांतिनिकेतन स्थित तालतोर की ऐतिहासिक घोष ज़मींदारबाड़ी में ढाई सदी से भी ज़्यादा समय से धन की देवी लक्ष्मी और ज्ञान की देवी सरस्वती की एक साथ पूजा की अनूठी परंपरा चली आ रही है। ज़मींदारी प्रथा समाप्त होने और आर्थिक तंगी के बावजूद, पांच पीढ़ियों से चली आ रही इस विरासत को परिवार और स्थानीय लोग आज भी पूरी आस्था के साथ निभा रहे हैं। यह आयोजन सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि बदलते समय के साथ भी सांस्कृतिक जड़ों और प्राचीन परंपराओं को जीवित रखने का एक अनूठा उदाहरण है।

फाइल फोटो सदी पुरानी अनूठी परंपरा: शांतिनिकेतन की घोष ज़मींदारबाड़ी में एक साथ पूजी जाती हैं लक्ष्मी और सरस्वती।|Arthik Dhara Photo
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